हमारी भूली बिसरी टांकरी

Date: 24 Oct 2016

टांकरी लिपि, पहाड़ी भाषा समेत उत्तर भारत की कई भाषाओँ को लिखने के लिए प्रयोग की जाने वाली लिपि. एक ज़माने में कुल्लू से लेकर रावलपिंडी तक हर तरह के पढने लिखने का काम टांकरी लिपि में ही किया जाता था. आज भी पुराने राजस्व रिकॉर्ड, पुराने मंदिर की घंटियों या पुराने किसी बर्तन में टांकरी में लिखे शब्द देखे जा सकते हैं.

टांकरी लिपि ब्राह्मी परिवार की लिपियों का ही हिस्सा है जोकि कश्मीरी में प्रयोग होने वाली शारदा लिपि से निकली है. जम्मू कश्मीर की डोगरी, हिमाचल प्रदेश की चम्बियाली, कुल्लुवी, और उत्तराखंड की गढ़वाली समेत कई भाषाएं टांकरी में लिखी जाती थी. हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा, ऊना, मंडी, बिलासपुर, हमीरपुर में व्यापारिक व राजस्व रिकॉर्ड और संचार इत्यादि के लिए भी टांकरी का ही प्रयोग होता था.


टांकरी वर्णमाला

लेकिन पिछले कुछ समय से टांकरी लिपि लगभग विलुप्त ही हो चुकी है. हिंदी और अंग्रेजी के उत्थान के साथ टांकरी ने अपना पतन देखा. या यूँ कहे की हम अपने पहाड़ों के इतिहास को सहेजने में विफल रहे. हालाँकि हमारे पडोसी राज्य पंजाब ने अपनी भाषा को सहेज भी और आगे भी बढ़ाया. यहां तक कि आज बहुत से लोग ये भी नहीं जानते हैं की हमारी पहाड़ी भाषा की कोई लिपि भी है. बेमुश्किल चंद लोग रहे होंगे जो टांकरी को लिख पढ़ सकते हैं.

ऐसे ही एक शख्स हैं श्री हरिकृष्ण मुरारी जी. हिमाचल से सम्बन्ध रखने वाली सांभ नामक संस्था ने टांकरी के श्री हरिकृष्ण मुरारी जी के साथ मिल कर टांकरी को पुनर्जीवित करने की ओर एक कदम उठाया है. लगभग 2 वर्षों के अनुसन्धान के बाद विभिन संग्रहालयों, खाताबहियों, शिलालेखों, राजस्व रिकॉर्ड से हासिल किये पत्रों की मदद से टांकरी का फॉन्ट तैयार करने में सफलता हासिल की है. इसके साथ ही सांभ सेमिनार और वर्कशॉप की सहायता से भी टांकरी का प्रचार प्रसार करने के लिए कोशिश कर रही है.

ये लेख सभी पाठकों को अपनी टांकरी से रूबरू करवाने की ओर हमारा भी छोटा सा प्रयास है. आशा है कि हम सब मिलकर टांकरी को पुनर्जीवित करने और उसे मुख्य धारा में लाने में सफल होंगे.



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